Thursday, December 18, 2008

हिन्दी पुस्तकालय काल दर्शक पंचांग !!!!!!!!!!


हिन्दी पुस्तकालय काल दर्शक पंचांग

Monday, December 8, 2008

कालसर्पयोग शांति महायज्ञ, २७ दिसम्बर २००८

फॅमिली पंडित.कॉम द्वारा वृन्दावन धाम में काल सर्प दोष निवारण महायज्ञ का आयोजन कराया जा रहा है 27 December 2008, जो जातक काल सर्प दोष से पीड़ित हैं और अपने जीवन में प्रगति नहीं कर पा रहे हैं, देव पित्र अमावस्या पर वृन्दावन के सुविज्ञ शास्त्रिओं द्वारा कराये जा रहे अदभुत महायज्ञ में योगदान करके ग्रहों की वाधाएं दूर कर सकते हैं॥ अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें... +919358144181

Monday, October 27, 2008

शुभ मुहूर्त पूजन के लिए

दीपावली का पूजन वर्ष भर की सुख समृद्धि का स्थायी कारक बन सकता है। फैमिली पंडित डॉट कॉम के आचार्य-शास्त्रियों ने सभी के लिए शुभ मुहूर्त निकाले हैं, जिनमें पूजन करने से न केवल आनंददायक अनूभति होगी, बल्कि घर-परिवार में सौभाग्य और समृद्धि की वृद्धि होगी। इन मुहूर्त में मन और विधि-विधान से मां लक्ष्मी का पूजन किया जाए तो घर में लक्ष्मी का स्थायी वास रहेगा।
दुकान, फैक्टरी, प्रतिष्ठान आदि के लिए दिन में मुहूर्त हैं तो घऱ की पूजा के लिए सायंकाल और रात्रि के मुहूर्त हैं। मंगलवार दीपावली के दिन चित्रा और स्वाति नक्षत्र का सुखद संयोग बना है। गणेश-लक्ष्मी के पूजन का क्रम पूरे दिन अलग-अलग समय में और मध्य रात्रि तक जारी रहेगा। आचार्यों का कहना है कि लग्नेश के स्वग्रही होने से भी विशेष लाभ का योग बन रहा है।
पंडित पवन दत्त शर्मा के अनुसार मंगलवार को प्रातः 10.19 से 12.23 तक धनु लग्न तथा 10.42 से 12.42 दोपहर तक लाभ का चौघड़िया है। दोपहर 12.14 से 12.23 तक अमृत का चौघड़िया रहेगा। इन अवधि में कारखानों, दुकानों और मशीन आदि के कायर्स्थल पर लक्ष्मी-गणेश का पूजन सर्वश्रेष्ठ रहेगा।
प्रदोष काल में आर्थिक प्रगति के लिए एक और श्रेष्ठ मुहूर्त वृष लग्न का है, जो सायंकाल में 6.26 बजे से रात्रि 8.23 बजे तक रहेगी। इसके बीच में लाभ का चौघड़िया सायं 7.02 से रात 8.38 बजे तक रहेगी, जो विशेष फल देने वाली है। रात में 8.29 से 10.42 तक मिथन लग्न और रात्रि में 10.42 से 1.02 बजे तक कर्क लग्न रहेगी। कर्क लग्न में पूजन करना अत्यंत लाभकारी रहेगा। निशीथ काल का पूजन सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके बाद सिंह लग्न सुबह के 4.35 बजे तक है, जिसमें पूजन और हवन का विशेष महत्व बताया गया है। मकर लग्न दोपहर 12.12 बजे से 2.05 तक है, इसमें पूजन से बचना चाहिए। कुछ विद्वानों के मुताबिक रात में कर्क लग्न के मुहूर्त में केतु की अशुभ दृष्टि रहेगी, लिहाजा उन्होंने इसमें पूजन न करने की सलाह दी है। सभी पूजन काल का समय दिल्ली के समयानुसार लिया गया है। सभी जन अपने स्थानीय समयानुसार पूजन मुहूर्त आचार्यों से निकालवा लें।

कैसे करें पूजन
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पूजन की प्रक्रिया शुरू करते ही सबसे पहले आसन शुद्धि और स्वस्ति पाठ करें और जल अक्षत लेकर पूजन का संकल्प लें। गणेश प्रतिमा का स्थापन कर षोड़षोपचार पूजन करें, फिर नवग्रह पूजन, षोड़शमातृका पूजन करें। तत्पश्चात कलश और महालक्ष्मी पूजन करें। संभव हो और स्फटिक के श्री यंत्र हों तो इनका दूध, दही आदि (पंचामृतस्नान) से अभिषेक करें। शुद्ध जल से स्नान के बाद उन्हें वस्त्र धारण कराएं। आभूषण पहनाएं। प्रसाद लगाएं। वस्त्र नहीं हैं तो कलावा अर्पित करें। केसर, चंदन, सिंदूर, सुगंधित तेल, अक्षत आदि चढ़ाएं। इसके बाद रोली, अक्षत, कुंकुम व पुष्प से मां के एक-एक अंग की पूजा करें। अष्ट सिद्धि, अष्ठ लक्ष्मी पूजन करें और
ऋतु फल समर्पित करें। तांबूल पूगी फल चढ़ाएं। और श्रद्धापूर्वक दक्षिणा चढ़ाएं। नमस्कार करने के बाद देहली विनायक पूजन, कलम-दावात पूजन, कुबेर पूजन, दीपक पूजन करें और आरती करें। अंत में क्षमा प्रार्थना भी करें।

Sunday, September 28, 2008

ज्योतिष शास्त्र नक्षत्र, योग, ग्रह तथा राशि आदि के तत्वों के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव व गुणों का निश्चय कर यह बतलाता है कि अमुक नक्षत्र, ग्रह और राशि के प्रभाव से उत्पन्न पुरुष का अमुक नक्षत्र, ग्रह और राशि से उत्पन्न नारी के साथ संबंध करना अनुकूल रहेगा या नहीं। ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। आचार्यों ने जन्म के समय चंद्रमा की स्थिति के आधार पर ही जन्म राशि तथा जन्म नक्षत्र के द्वारा मेलापक पद्वति का ज्ञान करना बताया है।
मेलापक पद्वति में जिन आठ बातों पर कुंडली मिलान की प्रक्रिया अपनायी जाती है, उनमें से एक से लेकर आठ तक का योग 36 बनता है। तथा निम्न क्रमानुसार उनके गुणों की संख्या निर्धारित है, जैसेः
वर्णः एक गुण
वश्यः दो गुण
ताराः तीन गुण
योनिः चार गुण
ग्रह मैत्रीः पांच गुण
गण मैत्रीः छह गुण
भकूटः सात गुण
नाड़ीः आठ गुण
इस तरह कुल योग 36 हुआ। गुणों की संख्या के आधार पर मिलान करने का नियम निर्धारित है। जितने अधिक गुण मिलते हैं, उसको उतना ही अच्छा माना गया है।
यहां अलग-अलग विधि का ज्ञान आपको कराने का प्यास किया जा रहा है, ताकि जन साधारण भी इस वैज्ञानिक पद्वति को समझ कर इसका लाभ पूरी तरह से उठा सके। साथ ही यहां यह भी बताया जाएगा कि आठ बिंदुओं में से प्रत्येक बिंदू अलग-अलग किन गुणों का प्रतिनिधित्व करता है। सबसे पहले लेते हैं वर्ण को...
वर्णः-ऋषियों ने बारह राशियों को चार प्रकार के वर्ण में विभाजित कर उनके बारे में बताया है। ये चार विभाजन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में बताये गये हैं। इसी तरह हरेक वर्ण से संबंधित राशियां भी निर्धारित हैं। ब्राह्मण गुण वाली राशियां कर्क, वृश्चिक तथा मीन हैं। क्षत्रिय वर्ण वाली राशियां मेष, सिंह तथा धनु हैं। वैश्य वर्ण वाली राशियां वृष, कन्या तथा मकर हैं और क्षूद्र वर्ण वाली राशियां मिथुन, तुला व कुंभ हैं। उक्त राशियो से संबंधित जातक संबंधित वर्ण के गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
ब्राह्मण वर्ण वाली राशियां ज्ञान, शिक्षा, खोज आदि के कार्यो में प्रवीणता लिए हुए होती हैं। क्षत्रिय वर्ण वाली राशियां सामाजिक रक्षा, सेना, पुलिस आदि सशस्त्र वलों के कार्यों की संचालन योग्यता रखने वाली होती हैं। वैश्य वर्ण सामाजिक आश्यकताओं की पूर्ति और उत्पत्ति आदि के विषय में योग्यता रखती है। शूद्र वर्ण वाली राशियां परिश्रम आदि के विषय में प्रवीणता रखती हैं।
कुंडली मिलान में उपरोक्त वर्णित विशेषताओं के प्रतिनिधित्व के गुणों द्वारा इस बात पर जोर दिया गया है कि कन्या का वर्ण वर के वर्ण से श्रेष्ठ नहीं होना चाहिए, जैसे कन्या वर्ण शूद्र है तो वर के किसी भी वर्ण से (36 गुणों में) एक गुण प्राप्त होगा। कन्या का वैश्य वर्ण होने पर वर के अन्य वर्णों से भी एक गुण प्राप्त होगा, परंतु यदि वर्ण शद्र वर्ण से संबंधित है तो शून्य गुण ही प्राप्त हो पाएगा।
कन्या का क्षत्रिय वर्ण होने पर वर केवल ब्राह्मण या क्षत्रिय वर्ण का ही होना चाहिए, तभी एक गुण प्राप्त होगा। अन्य वर्णों वैश्य या शूद्र वर्ण के वर से शून्य गुण ही प्राप्त हो पाएगा। इसी तरह यदि कन्या ब्राह्मण वर्ण की है तो वर का वर्ण भी ब्राह्मण होना चाहिए, तभी एक गुण प्राप्त होगा। अन्य तीनों वर्णों के वर से शून्य गुण ही प्राप्त हो पाएगा।
वश्यः-यह दूसरा बिंदू है, जिससे कुछ राशियों का संबंध चतुष्पादों से कुछ का द्विपाद से तथा अन्य राशियों का कीट, सर्प एवं जलचर से संबध बताया गया है। दोनों वर-वधु की कुंडली के मिलान का तात्पर्य वश्य के पूरी तरह मिलने से दो गुण (36 गुण में से) तथा कुछ समानता पाए जाने पर एक गुण और असमानता पाए जाने पर शून्य गुण प्राप्त होते हैं। इन्हीं गुणों का योग आगे जाकर कुंडली मिलान में कुल जितने गुण मिलते हैं, के योग में समाहित करते हैं।
शेष छह बिंदुओं के बारे में अगले लेख में बताया जाएगा।
आचार्य एल.डी.शर्मा
(लेखक मथुरा में ज्योतिष समाधान केंद्र के संचालक और familypandit.com सीनियर पैनलिस्ट हैं।)

Saturday, September 27, 2008

शादी से पहले कैसे मिलाएं गुण

(आज से हम गुण मेलापक कुंडली पर ज्योतिष सिद्धांत के जरिये जातकों को मेलापक विषय पर विस्तार से जानकारी उपलब्ध करा रहे है। उत्सुक गण इस विषय की गहराई में जाकर इसका लाभ उठ सकते हैं। प्रस्तुत है इसकी भूमिका..)
लव मैरिज करने वाले भी जन्म कुंडली मिलाने पर जोर दे रहे हैं, यह न केवल उनके लिए शुभ बात है, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी शुभ सोच है। इन दिनों फैमिली पंडित डॉट कॉम पर प्रेमी युगल कुछ ज्यादा ही रुचि ले रहे हैं। उनके द्वारा गुण मेलापक के बारे में जानने के लिए सैकड़ों की संख्या में मेल की गयी हैं।
अतः लोगों को यह बताना जरूरी हो गया है कि किस तरह गुण मेलापक चार्ट में नाड़ी दोष होने के बावजूद किस प्रकार उक्त दोष उन कुंडलियों पर लागू नहीं होता।
नाड़ी दोष का दुष्प्रभाव वर एव कन्या की प्रजनन शक्ति, स्वास्थ्य तथा आय़ु पर सीधा-सीधा पड़ता है। वर-वधु के समान जीन्स होने पर संतति पर स्पष्ट रूप से दुष्प्रभाव परिलक्षित माना जाता है। सामान्यतः गुणमेलापक चार्ट में विद्यमान नाड़ी दोष किन स्थितियों में अपना दुषप्रभाव नहीं छोड़ता, उन्हीं स्थितियों के बारे में ही यहां बताया जा रहा है।
योनि, गण एवं भकूट दोष का संतुलन ग्रह मैत्री होने से बना रहता है। चंद्र राशि के अधिपति (वर-वधु) जिस नवांश में हों, उन नवांश के अधिपति यदि आपस में मित्र हैं तो नाड़ी दोष शांत हो जाता है।
समान नक्षत्र होने से मेलापक चार्ट में नाड़ी दोष अंकित रहता है, परंतु ऐसा होने पर विभिन्न नक्षत्र चरणों में होने से तथा पद बाधा नहीं होने से नाड़ी दोष नहीं लगता। पद एक-तीन, दो-चार होने चाहिए। राशि एक होने पर तथा नक्षत्र अलग-अलग होने से नाड़ी दोष नहीं लगता।
राशि अलग होने से एवं नक्षत्र एक ही होने से नाड़ी दोष नहीं लगता। दोनों की चंद्र राशि का अधिपति एक होने से भी दोष का दुष्प्रभाव नहीं होता। राशि अलग-अलग हो, किंतु राशि स्वामी एक ही हो, तब भी दोष नहीं माना जाता।
गुण मेलापक कुंडली में नाड़ी दोष होने पर यदि राशि स्वामी शुभ ग्रह हो, जैसे गुरु, शुक्र, अंशानुसार चंद् और बुध हो तो नाड़ी दोष नहीं लगता। इसी प्रकार नाड़ी दोष उदासीन होने से अन्य दोष भी उदासीन हो जाते हैं।
गुण मेलापक पद्वति में जिन बातों का वर्णन है, वह आठ प्रकार की होती हैं तथा एक से आठ तक की संख्या के योग पर ऋषियों द्वारा 36 गुण निर्धारित किए गए हैं। ज्योतिष शास्त्र सूचनापरक पद्वति के आधाऱ पर पूर्व सूचना का आभास कराता है। विवाह के पहले वर-कन्या की जन्म कुंडली मिलान का आशय केवल परंपरा का निर्वाह नहीं है,यह भावी दंपत्ति के स्वभाव, गुण,प्यार तथा आचार व्यवहार के सबंध में ज्ञात कराने में सहायक होता है। जब तक समान आचार-विचार वाले वर-कन्या नहीं मिलते,तब तक मैरिज लाइफ सुखी नही हो सकती। जन्मपत्री में मेलापक पद्वति वर-कन्या के स्वभाव, रूप और गुणों को अभिव्यक्त करती है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह पद्वति विशुद्ध विज्ञान पर आधारित है।


आचार्य एल. डी शर्मा
सीनियर पैनलिस्ट
मोबाइल नंबर..919897073500
बेसिक-0565-2403623

Tuesday, September 16, 2008

सटीक एवं सूक्ष्म फलादेश की विधा है कृष्णमूर्ति पद्धति

भारतीय ज्योतिष और कृष्णमूर्ति पद्धति में मुख्य भेद इस बात को लेकर है कि जुड़वां बच्चे, जो चंद मिनट के अंतराल से पैदा होते हैं, उन दोनों की एक लग्न तथा एक समान भावों में ग्रह स्थित होने के बावजूद लक्षण अलग-अलग कैसे हो जाते हैं। पारंपरिक ज्योतिष के अनुसार दोनों के भाग्य एक जैसे होने चाहिए, लेकिन उनके भाग्य में बड़ा अंतर पाया जाता है। एक की मृत्यु हो जाती है, दूसरा लंबी आयु पाता है। या एक कपड़े का व्यापारी होता है तो दूसरा इंजीनियर बन जाता है।
कृष्णमूर्ति ने उप नक्षत्रीय सूत्र देकर इस प्रश्न को सहज ही हल कर दिया है। उन्होंने बताया कि दोनों की कुंडली में मुख्य अंतर भावों के उप नक्षत्रों से आता है। चाहें जन्म कुछ ही मिनट के अंतराल से क्यों न हुआ हो, भावों के उप नक्षत्र बदल जाएंगे। यदि इन उप नक्षत्रों पर विचार किया जाए तो जुड़वां बच्चों के भाग्यों का अंतर विस्तार से समझ सकते हैं। उनके सूत्र से विभिन्न भावों के उप नक्षत्रों को विभिन्न भावों के कारक निश्चित करके जीवन की तमाम घटनाओं के बारे में जान सकते हैं।
मुझे खेद है कि कृष्णमूर्ति के अनुयायी कारकों को उचित स्थान देने में भूल कर रहे हैं व वही भूल दोहरा रहे हैं, जो कुछ मिनटों के अंतर से जन्म लेने वाले बच्चों की कुंडली में फर्क करता है, जिनकी वही लग्न है और ग्रह भी उन्हीं भावों में बैठे हैं।
मान लीजिए कि एक कुंडली में मंगल सिंह राशि में 14 अंश पर है। यह शुक्र के नक्षत्र में तथा शुक्र के ही उप नक्षत्र में होगा। यदि कुंडली में शुक्र बारहवें भाव में है तो यह कहेंगे कि मंगल अपनी दशा में 12 वें भाव का फल प्रदान करेगा, जैसे हानि, व्यय, परेशानी व पराजय इत्यादि। और यही दूसरे की कुंडली में जिसने कुछ मिनट के अंतर से जन्म लिया है,तो क्या शुक्र उसमें भी 12 वें भाव का कारक होकर वही व्यथा-कथा कहेगा। वस्तुतः स्थिति यह नहीं है, क्योंकि अलग-अलग भावों के उप नक्षत्रों पर विचार नहीं किया गया है।
मेरा मानना है कि यदि शुक्र दसवें और 11 वें भाव का उप नक्षत्र है, तब मंगल दसवें एवं 11 वे भाव का फल बताएगा जैसे लाभ, जीत व प्रसन्नता आदि, इस स्थिति के साथ कि मंगल और शुक्र दोनों 12 वें भाव में बैठे हों। दूसरे व्यक्ति जिसने कुछ मिनट के बाद जन्म लिया है, उसका शुक्र 12 वें भाव का उप नक्षत्र हो सकता है, इसलिए उसके लिए मंगल 12वें भाव का कारक होगा। अतः कारकों का निर्धारण करने के लिए विभिन्न भावों के उप नक्षत्रों को चुनना चाहिए। इसके लिए कुछ चीजों का ध्यान रखना जरूरी है। जैसे-
1-जन्म के समय अथवा प्रश्न के समय के प्रत्येक भाव के सही अंश अंकित करें और प्रत्येक भाव की राशि, नक्षत्र स्वामी और उप नक्षत्र स्वामी अंकित करें।
2-जन्म के समय अथवा प्रश्न के समय के ग्रहों के सही अंश, राशि स्वामी, नक्षत्र स्वामी और उप नक्षत्र स्वामी अंकित करें।
3- हरेक भाव के कारक ग्रहों को भाव के नक्षत्र स्वामी और उप नक्षत्र स्वामी के अनुसार निश्चित करें।
4- सूक्ष्म को अत्यावश्यक स्थान मिलना चाहिए। इसके बाद प्रत्यंतर फिर अंतर और अंत में महादशा को स्थान देना चाहिए।
5-यदि छठे भाव का उप नक्षत्रेश वक्री हो तो यह विपक्षी को बुरा होता है, क्योंकि तब यह विपक्षी के लिए बारहवां स्थान होता है। इसलिए छठे भाव का वक्री उप नक्षत्रेश प्रतिस्पर्धा के कार्यों के लिए शुभ होता है, जहां विपक्षी से मुकाबला हो। इसी प्रकार 4,5,7 एवं 8 भावों को भी समझना चाहिए।
कृष्णमूर्ति ने जो दिशा हमें दी है, वह उनके उक्त कथन के आधार पर ज्योतिष के सत्य को प्रमाणित करने में सक्षम है। आवश्यकता है धैर्य एवं सूक्ष्म बुद्धि से उनके सूत्रों के विवेचन की, जिनमें वास्तविकता एवं सार्थकता स्पष्ट दिखायी देती है।

(लेखक कृष्णमूर्ति जी के विचारों से ही प्रभावित नहीं रहे, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलकर उन्होंने हजारों जातकों को सही मार्गदर्शन दिया है। वर्तमान वह कृष्णमूर्त ज्योतिष पर एक किताब नक्षत्र ज्योतिष लिख रहे हैं, जो शीघ्र प्रकाशित होने वाली है)।

-इंजीनियर रवींद्र नाथ चतुर्वेदी

Thursday, September 11, 2008

महा छप्पन भोग दर्शन १४ को


गोवर्धन में छप्पन भोग के दर्शन को पधारें-

रसिक बंधुवर,
हमारी कामना है कि श्री गिरिराज प्रभु का अलौकिक 16 वां छप्पन भोग महोत्सव एवं महा अभिषेक के अवसर पर आप सपरिवार साक्षी बन प्रभु के दुर्लभ दर्शन कर सहज सुखद अनुभूति का आनंद लें।
आपके आगमन की आकांक्षी
श्री गिरिराज सेवा समिति रजि। मथुरा

गोवर्धन श्री गिरिराज जी में अनंत चतुर्दशी के दिन श्री गिरिराज महाराज का अलौकिक छप्पन भोग 14 सितंबर को हो रहा है। श्री गिरिराज सेवा समिति द्वारा आयोजित होने वाला यह सोलहवां छप्पन भोग आयोजन है, जिसमें देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। आप भी गिरिराज महाराज के इन दुर्लभ दर्शन करके पुण्य लाभ अर्जित कर सकते हैं। यह जानकारी संस्थापक सदस्य मुरारी अग्रवाल ने दी है।

कार्यक्रम-
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महाभिषेक
13 सितंबर 2008
शनिवार प्रातः नौ बजे से

संत सेवा एवं महाप्रसाद
14 सितंबर 08
रविवार दोपहर 12 बजे से सायं 4 बजे तक

श्री छप्पन भोग दर्शन
14 सितंबर 08
रविवार अनंत चतुर्दशी दोपहर 2 बजे से रात्रि 12 बजे तक

स्थानः
गिरिराज तलहटी छप्पन भोग स्थल
संत पं. गया प्रसाद जी की समाधि के निकट
आन्यौर परिक्रमा मार्ग, गोवर्धन,मथुरा

ज्यादा जानकारी को संपर्क करें
09412281056
09837500191
09412777909